मुझे भक्त का तमगा लगने की परवाह नही

ये पोस्ट मैं अपने एक अंध मोदी विरोधी मित्र( दिल्ली यूनिवर्सिटी के उत्त्पाद) की पोस्ट की प्रतिक्रिया मे लिख रहा हूँ, जिन्होने मुझे मेरी एक रीसेंट पोस्ट पर अपनी कटुतापूर्ण प्रत्रिक्रिया भेजी क्य्युंकि उस आलेख मे मुझसे थोडी सी मोदी जी तारीफ हो गयी थी(सिर्फ एक लाईन, जोकि मैंने लिखा था कि मोदी जी को नया टाईटल देना चाहिये कि मोदी द सेवियर, और शेष पूरा आलेख इस कठिन समय के सकारात्मक पक्छ को लेकर था) और मुझे लगता है कि कोरोना का घटनाक्रम किसी भी तटस्थ व्यक्ति को मोदी जी की तारीफ करने को मजबूर करेगा ही, अतह अपने मित्र की पोस्ट के जवाब मे मुझे लगता है कि अब मुझे भक्त होने के टाईटल मिलने की परवाह किये बिना अपनी बात के समर्थन मे कुछ तथ्य मजबूती के साथ रखकर अपनी बात सिद्ध करनी चाहिये. मैं भारत की कोरोना के विरुद्ध लडाई मे सारा श्रेय मोदी जी को नही दे रहा हूँ और ये लडाई हम सब मिलकर सफलता पूर्वक लड रहे है और इसमे जीतेंगे भी, किंतु मोदी जी को भी उनके हिस्से का श्रेय क्यु सिर्फ इस वजह न दे, कि हमे भक्त का टाईटल मिल जायेगा.
मैं कुछ समय से काफी देशो के विशेषज्ञो की प्रतिक्रिया पढ रहा था और पढ रहा हूँ, और सब भारत मे महामारी और बडे मानवीय संकट की तरफ इशारा कर रहे थे किंतु हमने अपनी सीमाओ की रक्छा दुनिया के बाकी लोगो के मुकाबले काफी अच्छी तरह से की. भारत की और अंतर्राष्ट्रीय मीडीया द्वारा मोदी के द्वारा अपने नागरिको और पडोसियो के भी नागरिको को चीन और अन्न्य प्रभावित देशो से निकाल कर लाने का मजाक उडाया गया और इसे अनावश्यक जल्दबाजी करार दिया गया . फिर कहा गया कि भारत कोरोना रोकने के फर्जी दिखाउ प्रयास कर रहा है और भारत मे लाखो केसेस है और भारत उन्हे छुपा रहा है. चीन ने ऐसा ही किया था और कई देशो के नेताओ ने निर्णय लेने मे देरी की और इटली की सरकार ने तो चीन के दबाव मे मूर्खतापूर्ण हग द चाईनीज जैसे कार्यक्रम तक चलाये और खुद हमारे देश मे ममता बनर्जी ने मोदी जी की सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक उडाया था और कलकत्ते मे सार्वजनिक कार्यक्रम किये थे. अब दो महीने बाद देखे, ये सब क्या झूठे नही सिद्ध हो रहे और क्या बाकी दुनिया, ये नही कह रही कि डब्ल्यु एच ओ ने काफी देर से संकट को पहचाना और दुनिया को संकट मे डाल दिया. क्या यहा हमे मोदी जी को उनके संकट को सही समय मे भापने और कदम उठाने का श्रेय नही देना चाहिये?.उन्होने ( वैश्विक मीडीयाने) कहा था कि भारत ने पर्याप्त मात्रा मे परीछण नही किये और दो महीने बाद ज्यादा परीछण वाले देशो और हमारे देश मे महामारी के प्रभाव की जरा तुलना करे और बताये. हमारे प्रति दस लाख आबादी पर कोरोना केसेस का प्रतिशत सम्भवतह विश्व मे सबसे कम है. जब आपने उनका मजाक उडाया तो अब क्या इस कामयाबी का श्रेय मोदी जी प्रो एक्टिव अप्प्रोच को नही मिलना चाहिये? मैं स्थानीय अखबार की एक रिपोर्ट पढ रहा था कि श्मशान घाट पर 60% शव कम आ रहे है और अस्पतालो के ईमर्जेंसी वार्ड खाली पडे है क्युंकि लाॅकडाऊन की वजह से सडको पर वाहन नही है अतह एक्सीडेंट बंद है और वातावरण साफ है और कोरोना के डर से साफ सफाई बढ जाने से मलेरिया और अन्य बीमारियो का प्रकोप भी बहुत ही सीमित हो गया है. ये वही सरकारी तंत्र है जो कि ये सब कर रहा है जिसके काम को हम कोसते थे. क्या किसी प्राईवेट ( इकादुक्का अपवादो को छोडकर) अस्पतालो ने अपनी सेवाए प्रस्तावित की? कोरोना स्पेशल अस्पताल और क्वारंटाईन सेंटर सरकारी असपतालो मे ही बनाये जा रहे है. असली नेता वो होता है जो संकट को अवसर मे तब्दील कर दे और भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओ के साथ मोदी ऐसा ही कर रहे है. अब जब सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओ का ये परफोर्मंस बार जितना उठा है, क्राईसिस के खत्म हो जाने के बाद भी उससे बहुत नीचे नही जायेगा और आयुष्मान भारत तो मोदी जी का प्रिय प्रोजेक्ट है और इस प्रोजेक्ट को अब पर लगेंगे,क्युंकि धन पी एम केयर्स फंड मे आ रहा है और इस संकट के बहाने भारत वेंटिलेटर्स जैसे एड्वांस मेडिकल उपकरण भी बनाने जा रहा है और अगले दो सालो तक सारी सांसद और विधायक निधिया इस काम मे लगेगी, तो अब इस प्रोजेक्ट के लिये धन की कमी भी खत्म होने जा रही है. ये संकट शायद भारतके सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओ के दिन फिराने जा रहा है.
अब जरा हमारे महानगरो की ओर देखे. किस प्रभावी तरीको से लौकडाउन का पालन कराया जा रहा है.सडके साफ करी जा रही है, धोई जा रही है, सेनेटाईज करी जा रही है, कूडा हटाया जा रहा है और ये सब खामोशी से हो रहा है जब हम अपने घरो मे गम्भीरता से अपने घरो मे लौकडाउन का पालन कर रहे है. हम सब भी इस लडाई की सफलता के हिस्से है. विदेशो से लोगो को लाने के लिये क्या किसी प्राईवेट एयरलाईन ने अपनी सेवाए प्रस्तावित की ? क्या इस अंतर मे वर्तमान नेत्रत्व का कोई योगदान नही है? अरे आप लोगो को 22 मार्च की शाम के पांच बजे लोगो के ताली बजाने का कार्यक्रम व्यर्थ लगे( मैं देश के सबसे150 पिछडे जिलो मे से एक जिले के सूदूरवर्ती गाव मे रहता हूँ,और यहा भी लोगो ने पूरी शिद्द्त से थालीया बजाई थी) किंतु इस पहल का असर आप सरकारी सेवाओ मे लगे लोगो से बात करे तो आपकी समझ आयेगा और क्या हमे इसका श्रेय मोदी जी को नही देना चाहिये? यकीन माने अब विश्व के मीडीया का एक बडा हिस्सा और विश्व की एक बडी आबादी इस बात को मान रही है. इन उपायो को अब अन्य देश भी अपना रहे है. पाकिस्तान और ईरान के एयर ट्रैफिक कंट्रोल भारतीय पाईलटो को सलाम कर रहे है,क्या ये साधारण है और मेरी बात का सबूत नही?
इस लौकडाउन का भी मजाक उडा था और कहा गया था कि ये बिना तैयारी के अचानक किया गया लौकडाउन है. अरे जनता कर्फ्यु के बाद अगले दिन मैंने और ज्यादातर लोगो ने जाकर सोमवार को ग्रोसरी की खरीद की, क्युंकि मैंने और उन सब लोगो ने भी अनुमान कगाया था कि ऐसा कुछ होना चाहिये. अब अगर आपमे इतनी समझ भी नही है तो इसका हम क्या करे, क्या लौकडाऊन गाजे बाजे के साथ करना चाहिये था. सिर्फ दिल्ली के आन्नद विहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर भीड वाले और निजामुद्दीन मरकज वाले प्रकरणो को छोड दिया जाय तो लौकडाउन का पालन प्रभावी ढंग से हो रहा है और अगर ईन प्रकरणो की सही से जांच हो तो निश्चय ही इसमे कोई न कोई षडयंत्र अवश्य निकलेगा. सिंगापुर ने फिर ऐसा किया, स्पेन ने आखिरकार ऐसा किया और डोनाल्ड ट्रम्प की अमेरिका मे व्यापक रूप से समय पर लौकडाउन ना लगाने की आलोचना हो रही है और आज अमेरिका लौक्डाउन मे है किंतु 20000 हज़ार से ज्यादा (अभी ये संख्या बढ रही है) मौतो के बाद. अब इन वैश्विक नेताओ को देखते हुए हमे क्या प्रीएक्टिव अप्प्रोच के लिये अपने नेत्रत्व को श्रेय नही देना चाहिये? क्या ट्रम्प सहित सम्पूर्ण विश्व का नेत्रत्व भारत को दुनिया को हाईड्रोक्लोरोक्विन और पैरासीटामोल उपलब्ध कराने के लिये धन्यवाद नही दे रहा और मजे की बात है कि यही अमेरिका भारत की दवा कम्पनियो को कोसता था और आज हमे थैंक्यू कह कर हमसे दवाए ली जा रही है और पैसे दिये जा रहे है. इससे क्या ये सिद्ध नही होता कि अगर भारत मे कोरोना एक महामारी बन गया होता तो हम इलाज के लिये भी तैयार थे और आज उस दूरंदेशी की वजह से पैसे बना रहे है. सिर्फ पाकिस्तान को छोडकर,सारे सार्क देशो ने मोदी की पहल ना केवल सराहा बल्कि साथ हाथ मिलाया और हम देख रहे है कि सार्क देशो मे, सिवाय पाकिस्तान के, इस महामारी का प्रकोप कम है, और मोदी के नक्शे कदम पर जी 7 देsh भी चले और जी 20 देशो ने भी उसका अनुसरण किया और जी 20 देशो ने कोरोना से लडाई मे मोदी का नेत्रत्व पाने की इच्छा जाहिर की है. इस सबका क्या संकट खत्म होने के बाद हमारे उपर सकारात्मक प्रभाव नही पडेगा? क्या भारत की इज्जत इन दिनोमे और ज्यादा नही बढी ?, तो इसका श्रेय उस व्यक्ति को कैसे ना दे, जिसने आलोचनाओ और उद्ध्योग जगत के दबावो का विश्व के अन्न्य नेताओ के मुकाबली ज्यादा बहादुरी से सामना किया और मानवीयता की मानव स्वार्थ के उपर की परवाह की?
अब हमारे लोगो और उद्ध्योगो की दरियादिली भी देखे. अकेले पी एम केयर्स फंड मे 6400 करोड जमा हो चुके है और ये राशी बढती जा रही है और कही भी लौकडाउन की वजह से कोई भूखा नही सो रहा है. टाटा और महिंद्रा कारे अनाना बंद कर वेंटिलेटर बना रहे है. टाटा ने प्रसिद्ध ताज होटल को डाक्टर्स, नर्सेस और पैरामेडिकल स्टाफ के लिये खोल दिया है जहा उन्हे सब कुछ मुफ्त मे उपलब्ध कराया जा रहा है, रिलायंस ने अपने हस्पताल कोविड 19 के ईलाज के लिये सरकार को दे दिये है. वेदांता ने लाखो पी पी ई किट उपलब्ध कराये है तो साधारण लोग अपने खर्चे अप्र लोगो को मुफ्त मे मास्क बना बना कर दे रहे है. मंदिर और गुरुद्वारे, भारत और विश्व भर (न्युयार्क, लंदन,कैनबरा, पेरिस आदि) मे लंगर चला रहे है और लाखो लोगो को भोजन उपलब्ध करा है. हमारे सरकारी डाक्टर, नर्सेस और पैरामेडिकल स्टाफ, पोलिस और अन्य विभागो के लोग 18 18 घंटे काम कर रहे है. क्या हमे अपनी इस शिद्दत के लिये अपनी तारीफ नही करनी चाहिये? क्या इसने ही विश्व ko नही दिखाया कि हम अनोखे लोग है, और क्या वे हमे नही पहचान रहे है और इस महामारी के बाद के विश्व मे क्या हमारी नई पहचान नही होगी और इस अभियान का श्रेय क्या इसके नेता को भी नही मिलना चाहिये?
मुझे तो अपने भारतीय होने और अपने प्रधानमंत्री पर गर्व है, क्या आपको नही ?

नूतन चतुर्वेदी
9721012136
खंड बौद्धिक प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ,
जिला प्रमुख , विहिप ग़ौरक्छा
प्रांत प्रमुख , सुराज आंदोलन