कुछ दिनो पहले गूगल पर संघ के बारे कुछ जानकारी जुटाने के उद्देश्य से जब मैंने खोज की तो शुरुआत के सभी आलेखो मे मैंने संघ के उपर एक जैसे आरोप पाये. इन सभी लेखो मे दुखद तथ्य ये था कि ये सभी आरोप बिना किसी तथ्य के लगाए गये थे और प्रथम द्रष्टया शारारतपूर्ण थे. इन लेखो मे संघ के आंतरिक सूत्र का हवाला दिया था किंतु उनके नाम नही दिये थे,  या पूर्व मे ऐसे पूर्वाग्रही मष्तिष्को के लिखे हुए आलेखो और पुस्तको के उदाहरण थे जिन्होने भी ठोस सबूत कभी नही दिये.

यह सब देखकर मैंने सोचा कि इन आरोपो की छानबीन तथ्यात्मक रूप से की जाय तो मैंने मुख्य्तह उस समय के समाचार पत्रो या अन्य वैधानिक स्रोतो से प्राप्त जानकारी का अध्ययन किया. मैं इस लेख मे आपके सामने अपने विचार ज्यादा ना रख के वैधानिक व सत्य स्रोतो से प्राप्त जानकारी रखूंगा, आप उन्हे पढकर इन आरोपो की सत्यता का स्वयम निर्धारण करे. मेरा यहा एक अनुरोध और है कि अगर यह आलेख आपको तथ्यातमक लगे तो आप इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करे और लोगो को पढने हेतु प्रेरित करे ताकि ये लेख गूगल सर्च ईंजन पर उपर आ जाये और ज्यादा से ज्यादा लोग संघ को बेहतर तरीके से जान सके. प्रस्तुत है कुछ प्रमुख आरोप और उनके उत्तर

1.    संघ मुस्लिम विरोधी है और मुसलमानो से सब्जी नही खरीदने को लोगो को संघी उकसा रहे है.

उत्तर ∶ मेरे गाव के बाहर मे एक मोहल्ला जिसमे सारे यादव रहते है, वे कट्टर सपा समर्थक और भाजपा और संघ की कटु बुराई करने वाले है किंतु हमारे गाव मे सबसे पहले उस मोहल्ले की औरतो ने फेरी वालो से आधार कार्ड देखकर सब्जी और वस्तुए खरीदना शुरु किया और ये सुन कर सारे गाव मे ये फैला. मेरा पर्मानेंट ईलेक्ट्रीशियन बगल के गाव का मुस्लिम था किंतु बडे भाई साहब ने साफ शब्दो मे उससे बिगडे हुए सीलिंग फैन को सम्भलवाने से इंकार कर दिया, वे जन्मजात कांग्रेसी थे और अब सोनिया राहुल को सुनना पसंद नही करते. आपको याद ही होगा कि गाज़ियाबाद या इसके पास मे गल्फ को जाने वाले या आने वाले विमान की हुई दुर्घटना मे सेवा हेतु सबसे पहले संघ के स्वयम्सेवक पहुचे थे, ये जानते हुए भी कि, सवारो मे अधिकांशतह मुस्लिम होंगे.  इसके लिये अमीरात की सरकार ने संघ कार्यालय को धन्यवाद पत्र भी भेजा था.

संघ की मुस्लिम नीति को समझने के लिये डा. हेडगेवार का दिसम्बर 1935 वर्धा जिले के आर्वी के शीतकालीन प्रशिक्छण शिविर मे दिया हुआ उनका बौद्धिक पर्याप्त प्रकाश डालता है. उन्होने कहा था “गांधी जी हिंदु मुस्लिम एकता की बात करते है, मैं भी ये चाहता हूँ, लेकिन हमारा द्र्ष्टिकोण उनसे थोडा अलग है. गांधी जी कहते है कि An average Muslim is a bully and an average Hindu is a cowered (औसत मुसलमान धींग है और औसत हिंदु कायर). वह मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के द्वारा एकता स्थापित करना चाहते है. मैं महाभारत का यह श्लोक बताना चाहता हू .

ययोरेव समम वित्तम, ययोरेव समम बलम.तयोविर्वाहो मैत्री च न तु, पुष्टिविपुष्टयो

(समान शक्ति वालो एवम समान धन वालो के बीच मैत्री व विवाह सार्थक होते है. पुष्ट व अपुष्टो के बीच नही)

मेरे अनुषार मुस्लिमो को यह महसूस होता है कि वे हिंदुओ की तुलना मे अधिक संगठित है और जब तक यह भावना उनके मन मे है, तब तक शुद्ध एकता का संचार नही हो सकता है. जिस दिन उन्हे यह आभास हो जायेगा कि हिंदु भी संगठित हो गये है और वे आज़ादी प्राप्त करने मे सक्छम है, उस दिन वे स्वतह राष्ट्रीय धारा मे शामिल हो जायेंगे. “

संघ ने भारत की आजादी के लिये क्या किया है?

उत्तर ∶ संघ का जन्म 1925 मे हुआ और अंग्रेजो से स्वाधीनता के संग संघर्ष के काल मे संघ शैशवावस्था मे था और अधिकतर संघ स्वयम्सेवक बाल्यावस्था मे थे, और क्युंकि डाक्टर जी ने किशोरो और तरुणो के बीच संघ कार्य योजनानुषार किया क्युंकि वो तात्कालिक उदेश्यो के लिये नही वरन भारत फिर गुलाम ना हो, ऐसी स्तिथी के लिये कार्य कर रहे थे किया अतह संघ अपने इस दीर्घकालीन उद्देश्यो की पूर्ती मे लगा रहा, किंतु संघ संस्थापक डा. हेडगेवार ने जीवन पर्यंत देश की स्वतंत्रता हेतु प्रयास किया, यहा प्रस्तुत है इस सम्बंध मे प्रमाण

बालपन व किशोरावस्था मे डा. हेडगेवार के स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास

“जिस आयु मे अन्न्यान्य बालक खेल कूद मे व्यस्त रहते है, उसी आयु मे अंग्रेजो को निकाल बाहर करने का यह उद्देश्य पूर्ण होनेसे पूर्व ही वह सेनापती अपने छोटे से गुर्रिले दल के साथ घर वालो द्वारा बंदी बना लिया गया. “ (आबाजी हेडगेवार के संस्मरण (बचपन मे बालक केशव ने नागपुर मे सीताबर्डी किले के उपर से यूनियन जैक उतारने हेतु वझे गुरुजी के घर से सुरंग खोदने का कार्य शुरु किया था और लगभग 600 मीटर सुरंग खोदने के बाद पकड लिये गये थे.)

“सोलह वर्ष की आयु मे उन्होने (डा. हेडगेवार ने) एक चर्चा मंडल की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य सम्वयस्को मे राष्ट्रीय बदलावो की चर्चा एवम क्रांतिकारी गुणो का विकास करना था. इसका नाम देशबंधु समाज था”.(बालशास्त्री हरदास, आर्म्ड स्ट्रगल फार फ्रीडम, प्रष्ठ संख्या 372)

“गुस्से से लाल पीले होकर विद्ध्यालय नीरीछ्क प्रधानाअह्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे मे गये और बिना बात किये अपनी टोपी (हैट) लेकर सीधे चले गये. इसके तुरंत बाद उन्होने विध्यालय प्रबंध समिती के चेयरमैन विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रो को अनुशाषनहीनता के लिये अविलम्ब सजा देने की मांग की. “( गोविंद गणेश आबदे, महराष्ट्र, 28 जुलाई, 1940,पृ 12 ( बचपन मे बालक केशव ने मध्य भारत मे जारी रिस्ले सर्कुलर के विरुद्ध वंदेमातरम आंदोलन के दौरान अपने स्कूल मे विद्ध्यालय नीरछ्क के नीरीछण के दौरान सारे स्कूल के बालको को वंदेमातरम का नारा प्रत्येक क्लास मे लगाने की योजना बनाई और उसे कार्यानवित किया).

“विध्यालय प्रबंध समिती के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हज़ार छात्र अनिश्चितकालीन हडताल पर चले गये और ये हडताल दो महीने तक चलती रही.” (गोविंद गणेश आबदे, महराष्ट्र, 28 जुलाई, 1940,पृ 12)

“फलतह सितम्बर माह मे केशव को विध्यालय से निष्कासित कर दिया.” (गोविंद गणेश आबदे, महराष्ट्र, 28 जुलाई, 1940,पृ 12)

“रामपायली मे केशव के सहयोगियो का एक अच्छा खासा दल था. घटना 1998 की है. केशव ने अगस्त माह मे पुलिस चौकी के उपर बम फेका, जो निकट के तालाव के पास फटा. परंतु कोई ठोस प्रमाण ना होने की वजह उनपर मुकदमा नही चलाया गया. ”  (पालिटिकल क्रिमिनल्स हूज हू, द आफिस आफ द डायरेक्टर क्रिमिनल इंटेलिजेंस, जनवरी 1914. पृ 97.)

 

केशव को विद्ध्यालय से निष्कासित करने के विरोध मे जब छात्रो ने छिटपुट रूप से यूरोपियन लोगो, सरकारी अधिकारियो और राजभक्तो को वंदेमातरम कहकर चिडाना शुरु कर दिया तब मध्य प्रांत के मुख्य आयुक्त रेजिनलैंड क्राडोक ने पुलिस महानीरीछक सी आर क्लीवलैंड को पत्र लिखकर कहा कि ” पुलिसनागपुर मे छात्रो की गुंडागर्दी से जिस प्रकार निपट रही है, उससे मैं एकदम संतुष्ट नही हूँ. अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारे सभी सम्माननीय लोग नागपुर से भाग जायेंगे. “(मध्य प्रदेश मे स्वंत्रता आंदोलनका इतिहास, पृ 212 और 215)

“रामपायली मे दशहरे के उत्सव के उपलक्छ्य मे सीमोल्घन उत्सव के दौरान केशव के भाषण से पूरे वातावरण मे वंदेमातरम गूंजने लगा. प्रशाषन और पुलिस को जैसे ही सूचना मिली, वे सक्रिय हो गये.ये घटना आगे ना बडे इसिलिये दमनकारी कार्यवाही शुरुकी गई. केशव के दो साथियो दबीर एवम भगोरे को स्कूल से निकाल दिया और केशव को आपाराधिक दंड सन्हिता की धारा 108 के तहत राजद्रोही भाषण देने के लिये मुकदमा चलाया गया. ” (पालिटिकल क्रिमिनल्स हूज हू, द आफिस आफ द डायरेक्टर क्रिमिनल इंटेलिजेंस, जनवरी 1914. पृ 97.)

तरुणावस्था और छात्र जीवन की अवस्था मे डा. हेडगेवार के स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास ( मुख्यतह सशस्त्र क्रांति मार्ग पर )

“हेडगेवार कलकत्ता पहुचते ही अनुशीलन समिति से जुड गये थे. जब हेडगेवार नेशनल मेडिकल कालेज के छात्र थे, तब बांग्ला मे लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक बांगलार विप्लववाद के लेखक नलिनि किशोर गुहा भी वहा पढ रहे थे.गुह ने ही हेडगेवार, नारायण सावरकर एवम अन्य छात्रो को समिती मे प्रवेश दिलाया था. ” ( त्रैलोक्य नाथ चैटर्जी, थर्टी ईयर्स इन प्रिजन, पृ 277 और 78, 1963,)

“हेडगेवार सच्चे अर्थो मे क्रांतिकारी थे. समिती के सद्स्यो के बीच वह रचनात्मक सोच के लिये जाने जाते थे. क्रांतिकारियो के बीच हेडगेवार का छ्द्म नाम कोकेन था और वे शस्त्रो के लिये एनाटोमी शब्द का प्रयोग करते थे. ” (मेमोरीज आफ नलिनी किशोर गुहा, पृ संख्या 87)

“श्याम सुंदर चक्रबर्ती का उनके प्रति अगाध प्रेम था. हेडगेवार का उनके घर आना जाना लगा रहता था. अन्य क्रांतिकारियो की तरह ही चक्रवर्ती की आर्थिक हालत दयनीय थी. उनकी पुत्री के विवाह मे उत्त्पन्न आर्थिक संकट दूर करने मे हेडगेवार ने काफी तत्परता दिखाई थी. उन्होने धन संग्रह करके उन्हे समर्पित किया था. दूसरे प्रमुख राष्ट्रवादी मौलवी लियाकत हुसैन द्वारा आयोजित सभाओ, प्रभात फेरियो मे हेडगेवार अवश्य जाते थे. दोनो के बीच प्रगाडता का ही परिणाम था कि हेडगेवार के निवेदन पर हुसैन ने फैज कैप पहनना बंद कर गांधी टोपी पहनना शुरु कर दिया था. “ (अतुल्य रत्न घोष,मार्ड्र्न रिव्यु, मार्च 1941)

“हेडगेवार मोतीलाल घोष, डा आशुतोष मुखर्जी जैसे लोगो के निकट रहे और रासबिहारी बोस और विपिनचंद्र पाल से भी उनका परिचय था. हेडगेवार ने अपने सात्विक चरित्र, प्रतिबद्धता और असाधारण संगठन कौशल से नौजवान क्रांतिकारियो का दिल जीत लिया था, और उनके प्रति भक्तिभाव रखने वाले देशभक्तो की बडी जमात थी. “ (बालशास्त्री हरदास, आर्म्ड स्ट्रगल फार फ्रीडम, प्रष्ठ संख्या 373)

“हेडगेवार बंगाल और मध्यप्रांत की क्रांतिकारी गतिविधियो के बीच कडी का भी काम कर रहे थे. सन 1910 से 1915 के बीच बडी मात्रा मे पिस्तौल और अन्न्य अस्त्र शष्त्र बंगाल से मध्य प्रांत भेजे गये. हेडगेवार जब भी नागपुर आते थे तब अपने साथ छिपा कर अस्त्र शष्त्र लाया करते थे“ (जी वी केतकर, रणझुणकर, पी सी खानखोजेयांचा चरित्र, पृ 12)

जनवरी 1914 मे भारत सरकार के क्रिमिनल इंटेलीजेंस आफिस ने भारत के राजनीतिक अपराधियो की एक पुस्तिका प्रकाशित की थी. इसमे सिर्फ उन लोगो के नाम शामिल किये गये थे जो क्रांतिकारी संगठनो और गतिविधियो से जुडे थे और जिन्हेबम और दूसरे विस्फोटक बनाने आते थे. यह पुलिस और इंटेलीजेंस के बीच बुक 1914 के रूप मे जानी जाती थी. इसमे मध्य प्रांत से डा हेडगेवार का नाम शामिल था और उनकी शारिरिक संरचना और नील सिटी स्कूल से लेकर अनुशीलन समिति तक की उनकी गतिविधियो की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से  डा. हेडगेवार के स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास

“क्रांतिकारी योजना की विफलता एवम इस मार्ग की सीमाओको देखने के के बाद डा. हेडगेवार ने संगठित जन आंदोलनो का मार्ग स्वीकार किया.वह कांग्रेस के सदस्य बने और प्रथम विश्व युद्ध के बाद उन्होने इसी के मंच से जन जाग्रति का कार्य आरम्भ किया.“ (डी वी केलकर, द आर एस एस, ईकोनोमिक वीकली,  4 फरवरी 1050, पृ 132)

“कांग्रेस मे डा. हेडगेवार की सक्रियता बढने के साथ उन्हे दायित्व भी मिलने लगा था. मध्य प्रांत मे चौदह हिंदी भाषी जिले थे और चार मराठी भाषी. किंतु कांग्रेस के पास एक भी हिंदी पत्र पत्रिका नही थी. प्रांतीय कांग्रेस की तीन सद्स्यो वाली एक समिती ने हिंदी साप्ताहिक संकल्प के प्रकाशन का निर्णय लिया. दिनांक 1 फरवरी 1919 को सभी जिला ईकाईयो को एक अप्रिपत्र से इसकी सूचना दी गई और डा. हेडगेवार को पत्रिका के लिये ग्राहक बनाने एवम तीन वर्ष के लिये अग्रिम शुल्क ईकठ्ठा करने की जिम्मेदारी सौपी गई. डा. हेडगेवार ने पूरेप्रांत का दौरा शुरु किया. यह कार्य शुरु मे थोडा कठिन था क्युंकि पहले अनेक पत्र पत्रिकाए ने लोगो से अग्रिम शुल्क लेने के बाद बंद हो चुकी थी अतह लोगोकेमन मे विश्वनीयता का संकट था. डा. हेडगेवार ने डा. मुंजे को पत्र लिखकर अपने अनुभवो से अवगत कराया. उन्होने लिखा -लोग तीन वर्षो के लियेअग्रिम शुल्क देना पसंद नही करते है. इसका कारण है कि पहले सामाजिकउद्देश्यो से इकठ्ठा किये गये धन का उचित ढंग से उपयोग नही हो पाया . “ (मुंजे पेपर्स, डा. हेडगेवार द्वारा मुंजेको पत्र, 24 फरवरी 1919.)

“सन 1921 मे जनवरी से मई महीने तक मध्य प्रांत मे सात लोगो पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया था, इनमे नागपुर से डा. हेडगेवार भी थे. उन पर आपराधिक दंड सन्हिता की धारा 108 के अंतर्गत 1921 मे मुकद्दमा दर्ज किया गया. उनकी उत्तरोत्तर सरकार विरोधी गतिविधियो के कारण साम्राज्यवादी प्रशाषन उन्हे दंडित करने के लिये कृतसंकल्प था, तभी तो छ्ह महीने पूर्व (अक्तूबर 1920 मे) काटोल एवम भरतवाडा की सभाओ मे दिये गये उनके भाषणो को मुकद्दमे का आधार बनाया गया. “ ( महाराष्ट्र, 15 जून 1921, पृष्ठ 4.)

“ईंग्लैंडको परतंत्र करके उस पर राज्य करने की हमारे कोई इच्छा नही है, लेकिनहम भी अपने देश पर उसी प्रकार शाषन करना चाहते है जैसे ब्रिटेन के लोग ब्रिटेन पर और जर्मनी के लोग जर्मनी पर शाषन करते है. हमे पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये और इस पर हम कोई समझौता नही कर सकते. अंत मे उन्होने सरकारी वकील से पुनह सारगर्भित सवाल किया – क्या स्वतंत्रता की इच्छा रखना नैतिकता और कानूनके विरुद्ध अपराध है? मेरा पूर्ण विश्वास है कि कानून का निर्माण नैतिकता के हनन के लिये नही,बल्कि उसकी रक्छा के लिये होता है.“(अपने उपर राजद्रोह के चालाये हुए मुकदमे मे स्वयम पैरवी करते हुए न्यायाधीश स्मेली की अदालत मे डा. हेडगेवार के बयानो से उद्ध्वत)  महाराष्ट्र, 10 अगस्त 1920, पृष्ठ 5

“न्यायालय मे डा. हेडगेवार का वक्तव्य बडा सपष्ट एवम सरल था. यध्यपि डा. चोलकर की तरह ही उन्होने स्वतंत्रता का लक्छ्य का प्रतिपादन किया, तथापि उन्हे एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी गयी. इस प्रकार की सजा नौकरशाही पर आधारित व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश एवम घृणा पैदा होने से रोक नही सकती है “ ( उदया, सम्पादकीय द्वारा बी जी खापर्डे , 1921,पृष्ठ 35.)

“यध्यपि (संघ के स्वयमसेवको को) कठोर काम करना पडता है फिर भी वे खुश नजर आ रहे थे. वे सभी जेल की वेशभूषा मे थे. डा. हेडगेवार जेल की वेशभूषा मे नही थे, परंतु उन्होने शिकायत की थी कि उपर के अधिकारियो के आदेश से उनके साथ बुरा व्यवहार किया जा रहा है. इंस्पेक्टर जनरल मेजर जठार जेल आये थे लेकिन डा. हेडगेवार का कहना था कि उन्होने इस पर कोई ध्यान नही दिया. मैंए वार कौन्सिल के डिक्टेटर श्रीराम से कहा कि वह इस सम्बंध मे विरोध प्रस्ताव पारित करे. “ (मुंजे पेपर्स, 29 जुलाई 1930 ( कांग्रेस के जंगल सत्याग्रह भाग लेने हेतु कारावास की सजा काटते हुए, डा. हेड्गेवार से जेल मे हुई डा. मुंजे की मुलाकात के परिप्रेछ्य मे.)

“नागपुर की एकमात्र चिंताजनक बात वहा राष्ट्रीय स्वयम्सेवक संघ की उपस्तिथी है. इसके नेता निश्चित तौर पर सरकार विरोधी आंदोलनो से जुडे रहे है, अतह इस आन्दोलन पर सतर्कता से ध्यान रखने की आवश्यकता है “ ( मध्यप्रांत एवम बरार की राजनैतिक स्तिथी पर रिपोर्ट, जुलाई ( उत्तरार्ध) 1932. FL/P & J /12/40.)

“सरकारी कर्मचारियो की राजनैतिक आंदोलनो के प्रति भूमिका का विवरण सरकारी कर्मचारी के आचार सन्हिता के नियम 23 मे दिया गया है. तदनुषार उन्हे इस प्रकार के सभी कामो से अलग रहना चाहिये. सरकार का सुनिश्चित मत है कि राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ नाम के संगठन के स्पष्ट्तह साम्प्रदायिक स्वरूप तथा राजनैतिक आंदोलनो मे उसके अधिकाधिक भाग लेने के कारण सरकारी कर्म्चारियो का उस संगठन के साथ सम्बंध उनके निस्पक्छ कर्तव्य पालन के साथ असंगत है या हो सकता है. अतह सरकार ने निर्णय लिया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को राष्ट्रीय स्वयम्सेवक संघ का सदस्य बनने अथवा उसके कार्यक्रमो मे भाग लेने की अनुमति नही होगी. “ (फाईल 88 33, ग्रह (राजनैतिक), राष्ट्रीय अभिलेखागार , नई दिल्ली.)

(कुछ मूर्ख यह भी कहते है कि संघ के लोग अंग्रेजो की जासूसी करते थे, तो वो ये बताये कि अगर संघ ब्रिटिश सरकार का जासूस था तो सरकार क्यो अपने कर्म्चारियो को संघ मे जाने से प्रतिबंधित करती.)

“ डा. हेडगेवार मे संगठनकर्ता के रूप मे अत्यधिक छमता है और उसका स्वयमसेवी संगठन अनुशाषित एवम कुशल है. ड. हेडगेवार संघ का हिटलर है “(ब्रिटिश सरकार ने डा. हेडगेवार का मूल्यांकन करते हुए कहा था.) ( फाईल 88 33, ग्रह (राजनैतिक), राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली.)

(कांग्रेसी और कम्युनिष्ट आज भी ब्रिटिश सरकार द्वारा संघ पर लगाये आरोप दोहराते है. ब्रिटिश सरकार डा. हेडगेवार को तो कारावास मे परेशान करती थी, तिलक लो मांडले जेल और सावरकर को कालापानी भेजती थी और गांधी और नेहरु के लिये आगा खान के महल को जेल बना देती थी, इससे विदेशी ब्रिटिश सरकार का किसके प्रति प्रेम था, क्या ये सिद्ध नही होता)

अब संघ के स्वयम्सेवको के स्वतंत्रता आंदोलन मे भाग लेने के दो उद्वरण भी लेते है -∶

1.    स्थान -श्रीनगर (कशमीर)

समय – 1947 का कबाईली हमला

शत्रु तेज गति से आगे बढ रहे थे कश्मीर को शीघ्र सैन्य मदद चाहिए थी.

दिल्ली के सेना कार्यालय से श्रीनगर को संदेश प्राप्त हुआ कि किसी भी परिस्थिति में श्रीनगर के हवाई अड्डे पर शत्रु का कब्जा नहीं होना चाहिए.शत्रु नगर को जीत ले,तो भी चलेगा,किन्तु हवाई अड्डा बचना चाहिए.हम हवाई जहाज से सेना के दस्ते भेज रहे है.

”हवाई अड्डे पर सर्वत्र हिम के ढेर लगे हैं. हवाई जहाज उतारना अत्यंत कठिन है.” श्रीनगर सें यह प्रति उत्तर आया.

“मजदूर लगाकर तुरन्त हटाइए.चाहे कितनी भी मजदूरी देनी पड़े और इस काम के लिए कितने भी मजदूर लगाने पड़े,व्यवस्था कीजिए.”

‘मजदूर नही मिल रहे हैं. मुसलमान मजदूरो पर इस समय भरोसा नही किया जा सकता.’

और ऐसे समय में सेना के प्रमुखों को संघ याद आया.

रात्रि के ग्यारह बजे थे. एक सैन्य जीप संघ- कार्यालय के आगे आकर रूकी .उसमें से एक अधिकारी उतरे.कार्यालय में प्रमुख स्वंय सेवकों की बैठक चल रही थी. श्री प्रेमनाथ डोगरा व अर्जुन जीं वही बैठे थें. सेनाधिकारी ने गंभीर स्थिति का संदेश दिया,फिर उसने पूछा- “आप हवाई अड्डे पर लगे हिम के ढेर हटानें का कार्य कर सकेंगे क्या?”

अर्जुन जी ने कहा- “अवश्य! कितने व्यक्ति सहायता के लिए चाहिए.”

‘कम से कम डेढ़ सौ,जिससे तीन-चार घंटों में सारी बरफ हट जाये.”

अर्जुन जी ने कहा – “हम छः सौ स्वयंसेवक देते है.”

“इतनी रात्रि में आप इतने…..?” सैन्य अधिकारी ने आश्चर्य से कहा

“आप हमें ले जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था कीजिए।४५ मिनट में हम तैयार है.”

संघ कि पद्धति का कमाल था कि तय समय पर सभी 600 स्वयंसेवक कार्यालय पर एकत्र होकर साथ साथ चले गये. दिल्ली को संदेश भेजा गया-“बरफ हटाने का काम प्रारंम्भ हो गया है. हवाई जहाज कभी भी आने दें.”

“इतनी जल्दी मजदूर मिल गये क्या”

‘हाँ, पर वे मजदूर नही, सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं.’

रात्रि के डे़ढ बजे वे काम पर लग गये. २७अक्टुम्बर को प्रातः के समय प्रथम सिख रेजीमेन्ट के ३२९ सैनिक हवाई जहाज से श्रीनगर उतरे और उन्होने बड़े प्रेम से स्वंय सेवको को गले लगाया. फिर क्या था एक के बाद एक ऐसे आठ हवाई जहाज उतरे.

उन सभी में प्रयाप्त मात्रा में शस्त्रास्त्र थे. सभी स्वंयसेवको ने वे सारे शस्त्रास्त्र भी उतार कर ठिकाने पर रख दिये .हवाई अड्डा शत्रु के कब्जे में जाने से बच गया. जिसका सामरिक लाभ हमें प्राप्त हुआ. हवाई पट्टी चौड़ी करने का कार्य भी तुरन्त करना था, इसलिए विश्राम किये बिना ही स्वंयसेवक काम में जुट गये.

संदर्भ पुस्तक :-

न फूल चढे न दीप जले।

जब तिरंगा गर्व से फहरा उठा

15 अगस्त 1947 को अंग्रेज देश से चले गये और फ्रांस के कब्जे वाले पुडुचेरी, कारकिल और चंद्रनगर भी भारत मे मिल गये किंतु पुर्तगाल के कब्जे वाले गोवा, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव पुर्तगाल के कब्जे मे बने रहे. जब जवाहरलाल नेहरु की सरकार ने इनकी मुक्ती हेतु कोई प्रयास नही किया तो संघ के स्वयम्सेवको ने इन्हे मुक्त कराने का संकल्प किया और 2 अगस्त 1954 को इन छेत्रो को पुर्तगाली कब्जे से मुक्त कराया.

वरिष्ठ कार्यकर्ताओ से अनुमति लेकर संघ के प्रचारक रामभाउ वाकणकर के नेत्रत्व मे स्वयम्सेवको ने साधन एकत्रित किये. उस समय यद्यपि गांधी वध के आरोप से संघ को मुक्ती मिल चुकी थी किंतु सामान्य जनमानष संघ से समरस नही था अतह साधन जुटाने के लिये प्रसिद्ध मराठी गायक सुधीर फडके ने प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर के साथ एक संगीत कार्यक्रम के माध्यम से धन एकत्रित किया तो वही गुजराती, मराठी, कोंकणी आदि 14 भाषाओ के जानकार विश्वनाथ नरवणे ने सिल्वासा मे रह कर व्यूह रचना की और  31 जुलाई को सब चुने हुए स्वयम्सेवक ( इस दल का नाम मुक्ति वाहिनि रखा गया)  पुणे मे एकत्रित हुए अलग अलग दलो मे बंट कर भारी बारिश के बीच मुम्बई से ट्रेन मे सवार होकर सिल्वासा पहुच गये.

1 अगस्त की रात तय समय पर सब वाहिनियो ने छेत्र की राजधानी सिल्वासा मे एकसाथ पुलिस थाने, न्यायालय, जेल आदि पर हमला बोल कर उन्हे मुक्त करा लिया. पुर्तगाली सैनिको ने इन स्वयम्सेवको के अचानक हमले से घबराकर हथियार डाल दिये. अब सब स्वयमसेवक पुर्तगाली शाषन के मुख्यालय पहुच गये. थोडे ही संघर्ष से वहा के प्रमुख प्रशाषक फिदाल्गो और उसकी पत्नी को बंदी बना लिया गया, बाद मे उनकी प्रार्थना पर उन्हे सुरक्छित बाहर जाने दिया गया. दो अगस्त 1954 की सुबह जब सूर्योदय हुआ तो सबने पुर्तगाली शाषन के मुख्य भवन और सब स्थानो पर तिरंगा फहरते देखा.

आज यह सुनने ये बडा आश्चर्यजनक लगता है कि मात्र 116 स्वयमसेवको ने कुछ ही घंटो मे इस छेत्र को स्वतंत्र करा लिया किंतु ये सब संघ की कार्यपद्वती मे दीछित स्वयम्सेवको की विस्त्रत योजना और गोपनीयता का ही कमाल था. इस संघर्ष मे उपर वर्णित स्वयमसेवको के अतिरिक्त मुख्य रूप से सर्वश्री बाबुराव भिडे, विनायकराव आप्टे, बाबासाहब पुरंदरे, डा श्रीधर गुप्ते, बिंदु माधव जोशी, मेजर प्रभाकर कुल्कर्णी, श्रीक्रष्ण भिडे, नाना काजरेकर, त्रयम्बक भट्ट , विष्णु भोसले, श्रीमती ललिता फडके व श्रीमती हेमवती नाटेकर की प्रमुख भूमिका थी.

यहा पर एक बात उल्लेखनीय है कि चूंकि इन छेत्रो को संघ के स्वयमसेवको ने मुक्त कराया था अतह तब की नेहरु सरकार ने इन स्वयम्सेवको को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा भी नही दिया और उनकी कोई सराहना भी नही की. भारत सरकार की इस गलती को अ‍टल बिहारी बाजपीई की सरकार ने 1998 मे सुधारा और इस स्वतंत्रता आंदोलन को मान्यता दी.

संदर्भ पुस्तक :-

बौधिक पुस्तिका (जुलाई- सितम्बर), कानपुर प्रांत. आलेख: नूतन चतुर्वेदी

उपरोक्त उदाहरणो को को पढकर आप स्वयम ही समझ गये होंगे कि संघ संस्थापक बचपन से लेकर जीवन पर्यंत भारत की आजादी हेतु किये जाने वाले संग्राम मे लगे रहे और इसके साथ साथ अन्य चार संस्थापक सदस्य जैसे डा. मुंजे,डा. एल वी परांजपे (जिन्हे ड. हेडगेवार जी ने जंगल सत्याग्रह मे भाग लेने जाने का निर्णय करने पर सर संघचालक बनाया था) व बाबा राव सावरकर अपने समय के प्रसिद्ध कांग्रेसी और हिंदु महासभा के नेता थे. किशोर और तरुण स्वयम्सेवको को डा, हेडगेवार राजनैतिक आंदोलनो मे भाग लेने को प्रोत्साहित नही करते थे और उन्हे आगे की चुनौतियो हेतु तैयार करने हेतु अत्यंत गम्भीर थे और इसका परिणाम भी सामने आया जब सैकडो उच्च शिक्छित स्वयम्सेवक देश के विभिन्न भागो मे प्रचारक के नाते गये और उन्होने संघ कार्य को अल्प समय मे अखिल भारतीय स्तर पर खडा कर दिया. संघ के स्वयम्सेवको के कार्यो की चर्चा इसीलिये भी नही होती क्युंकि डा. हेडगेवार प्रसिद्धी परामुखता के कठोर आग्रही थे .वह व्यक्ति पूजा की प्रचलित परम्परा को हिंदु समाज की ना केवल सबसे बडी बुराई मानते थे बल्कि हिंदु समाज के पतन का कारण भी मानते थे. “उन्होने कहा था – व्यक्तिवाद ने राष्ट्रवाद के भाव को विस्थापित कर दिया है. संघ इसी व्यक्तिवाद को मिटकर शुद्ध राष्ट्रवाद को स्थापित करना चाहता है.

“ (काल, 23 जून, 1940.)

संघ मे शाखाओ मे ये गीत स्थापना के समय से गाया जाता रहा है –

वृत्त पत्र मे नाम छपेगा, पहनुंगा स्वागत मनुहार. छोड चलो यह छुद्र भावना,हे हिंदु राष्ट्र के तारण हार.

कंकड पत्थर बन बन हमको,राष्ट्र नीव को भरना है. ब्रह्म तेज के छत्र तेज के, अमर पुजारी बनना है.

यही वजह है कइ संघ के स्वयम्सेवक ये मानते है कि राष्ट्र माता है और माता की सेवा करने के बाद उसका ढोल पीटना निंदाजनक है अतह संघ मे प्रसिद्धि परामुखता पीडी दर पीढी चलती आई है और आगे भी चलती रहेगी. यही वजह है कि संघ के स्वयम्सेवको के कार्य प्रचार माध्यमो के अंग प्रयत्न्पूर्वक नही बनाये जाते.

2.    संघ के स्वयम्सेवक गुरुदक्छिणा ऐसे लोगो से भी कराते है जो कि कभी संघ की शाखा मे नही आये और ऐसे लोग बाद मे संघ को बुरा भला कहते है

उत्तर ∶ संघ के द्वारा एकत्रित गुरुदक्छिणा का एक छोटा भाग ही संघ के कार्यो पर वास्तव मे खर्च होता है और शेष राशी आनुषांगिक संगठनो मे बांट दी जाती है. एक आध आनुषांगिक जैसे भाजपा, विहिप को छोड दे, शेष अन्य आनुषांगिक आर्थिक रूप से सक्छम नही है. अपने 200 से ज्यादा आनुषांगिक संगठनो के माध्यम से संघ के स्वयम्सेवक समाज जीवन के प्रत्येक छेत्र जैसे, शिक्छा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, नवाचार, ग्राम्य विकास, नवोन्मेष आदि छेत्रो मे कार्य कर रहे है और व्यवस्था परिवर्तन मे इनकी भूमिका बढी ही कारगर है. अतह संघ परिवार के पास धन की कमी रहती है. मैं यहा एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा. बंगाल प्रान्त के संघ परिवार के वित्त व्यवस्था प्रमुख जुगल जी मेरी शाखा के स्वयम्सेवक थे अतह मेरा उनके घर नियमित आना जाना व स्नेह सम्बंध था अतह वे केवल मुझे या अपने पुत्र को ऐसी लिखा पढी मे शामिल करते थे, अपने स्टाफ को नही, इसिलिये मैं ये जानता हूँ. उन्ही दिनो माननीय अतुल जी जोग (जो कि पूर्वांचल कल्याण आश्रम के नागालैंड मे प्रमुख थे) ने सूचित किया कि स्थानीय कार्यकर्ताओ से दस प्रचारक नागालैड मे निकलने है अतह उनका वार्षिक खर्च दोगुना होने वाला है. इस सूचना ने जुगल जी को थोडी चिंता मे डाल दिया और उन्होने मुझसे पूछा कि मैं आगामी गुरुदक्छिणा मे कितनी व्रद्धि करूंगा तो मैंने 100 % व्रद्धि का बोला और नये 35 धनाढ्यो से गुरुदक्छिणा कराई और अपनी राशी को दोगुने से भी ज्यादा कर दिया, क्युंकि ये समय की मांग थी, क्युंकि नागालैंड मे एक चर्च के पादरी के पास से उसी समय 400 करोड रुपया पकडा गया था. इससे आप अंदाजा लगाये कि हमारे पूर्वांचल कल्याण आश्रम के नागालैड के उस समय के 35 लाख सालाना के वित्त वृत्त से हम ऐसी शक्तिशाली चर्च का कैसे मुकाबला कर रहे होंगे, और हमारे वित्त का प्रबंध करने वाले कार्यकर्ताओ पर हमेशा कितना दबाव रहता है.

अतह अगर आप योगेश्वर श्री कृष्ण को समझते है तो स्वयम समझ जायेंगे कि जब बडे उद्देश्यो हेतु काम करना हो तो साध्य की पवित्रता देखी जाती है, साधन की नही. कृष्ण का पूरा जीवन दर्शाता है कि साध्य पवित्र होना चाहिये, साधन की पकित्रता मायने नही रखती.साधन की पवित्रता मे जायेंगे तो प्रचलित मान्यताओ को कैसे तोडेंगे और अगर प्रचलित मान्यताए नही तोडी तो नया सृजन कैसे होगा.साध्य की पवित्रता पर निगाह रखे,साधन पर नही.

3.    संघ मे हिटलरशाही है.

उत्तर ∶ बालाघाट के दो दिवसीय कांग्रेस सम्मेलन मे डा. हेडगेवार अद्ध्यक्छ के नाते विद्ध्यमान थे. पहले दिन 16 दिसम्बर 1922 को तत्त्कालीन राजनीतिक विषयो पर चर्चा हुई. डा. हेडगेवार के अतिरिक्त सोमाजी पाटील, मोरेश्वर हेडगेवार,  ठाकुर नरहरी सिन्ह,बलवंत राव दीक्छित एवम पंडित नर्मदा प्रसाद ने अपने विचार व्यक्त किये. डा. हेडगेवार ने प्रतिनिधियो को व्यक्तिनिष्ठ होने के बजाय तत्त्वनिष्ठ होने की बात कही. उनके ही प्रभाव से दूसरे दिन खादी, स्वदेशी, ग्राम पंचायत एवम गोरक्छा जैसे विषयो पर प्रचार प्रसार करने हेतु प्रस्ताव पारित किये गये.ऐसा प्रस्ताव पारित होनाइसिलिये महत्तवपूर्ण हो गया था क्युंकि प्रांत के सभी बडे नेता, जिनका पहले उल्लेख किया जा चुका है, गांधीवादी कार्यक्रमो को सार्वजनिक रूप से अस्वीक्रत कर चुके थे. इतना ही नही, जब एक प्रस्ताव आया कि ‘यह सम्मेलन परिषद प्रवेश (कांग्रेस के अंदर विधान परिषद चुनावो मे भाग लेने के विषय मे बहस चल रही थी. कांग्रेस का एक वर्ग, जिसका प्रतिनिधित्व चितरंजन दास और मोती लाल नेहरु कर रहे थे, गांधी की नीतियो को अव्यवाहारिक मानता था. वे कांग्रेस के अंदररहते हुए, विधान परिषद के चुनावो को लडने के पक्छधर थे और मराठी मध्यप्रांत मे दास नेहरु के राजनीतिक दृष्टिकोण को अन्य प्रांतो की अपेक्छा व्यापक समर्थन मिला था) के प्रति विरोध प्रकट करता है’, तब सम्मेलन मे खलबली मच गयी. इस सम्मेलन के समर्थन मे पांच भाषण हुए. तब एक संशोधन प्रस्ताव परिषद प्रवेश के सम्बंध मे रखा गया. आरम्भ मे डा. हेडगेवार ने प्रतिनिधियो को समझाने बुझाने का प्रयत्न किया परंतु प्रतिनिधियो का एक वर्ग अपनी राय पर कायम रहा. तब उन्होने मत विभाजन की अनुमती दी और परिषद प्रवेश समर्थको की जीत हुई. डा. हेड्गेवार ने अपने मत को प्रतिनिधियोको थोपने के बजाय (वे परिषद चुनावो मे भाग लेने के विरोधी थे और गांधी के आंदोलनात्मक रुख से सहमत थे) लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उपयोग करना बेहतर समझा. ( महाराष्ट्र, 20 दिसम्बर 1922, पृष्ठ -4.)

संघ के जन्म से लेकर आजतक सभी निर्णय प्रतिनिधी सभाओ मे लिये जाते है और ये प्रथा आज तक कायम है. सभी प्रस्तावो पर बहस नही बल्कि विचार विमर्श होता है और लोगो को अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है. कैसे ये प्रक्रिया नीचे तक जाती है. बडे अधिकारी अनुशाषन के नाम पर प्रश्नो को दबाते नही है बल्कि स्वयम्सेवको को संतुष्ट करने का प्रयास करते है. वहा सामूहिक बैठको मे अनुशाषन अवश्य होता है और आप बैठक के दौरान अगर प्रश्नोत्तर कार्यक्रम है तो उस निर्धारित समय मे ही आप प्रश्न पूछ सकते है, किन्तु आप निर्भीक होकर पूछ सकते है.  उसके लिये मैं यहा एक निजी उद्वरण बताना चाहूंगा. राम मंदिर आंदोलन के दौरान मैं तरुण स्वयम्सेवक के नाते विद्ध्यार्थी शाखाओ का नगर कार्यवाह था और उसी दौरान शीत शिविर मे माननीय अशोक जी सिंघल का बौद्धिक हुआ और उनके बौद्धिक के पश्चात मैंने उनसे अनौपचारिक वार्ता मे प्रश्न पूछा था कि जब डाक्टर जी (संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार) मंदिर आंदोलनो मे भाग नही लेते थे तो आज संघ मंदिर आंदोलन मे क्यो कूदा, ये तो विश्व हिंज्दु परिषद का काम है वो ही करे. आपको यहा ये भी बताना जरूरी है कि उस समय मेरी अवस्था मात्र 14 वर्ष की थी किंतु अशोक जी ने मेरे प्रश्न को ध्यान से सुना और उसका उत्तर दिया. उन्होने मुझे बताया कि संघ का प्रथम उद्देश्य हिंदु समाज का संगठन है और आज हिंदु समाज आपस मे सडको पर लड रहा है (मंडल कमीशन को ले के बैकवर्ड और फोरवर्ड तो खालिस्तान के नाम पर सिख) तो ऐसे मे राम का ही सहारा है. उसके बाद उन्होने मुझे ये भी बताया कि कैसे राजीव गांधी राम मंदिर मुद्दे को केंद्र मे लाने के पश्चात मुस्लिम दबाव मे पीछे हट गये तो ऐसे मे अगर हिंदु समाज को हम संगठित कर लडाई न लडते तो ये हिंदु समाज के मनोबल के लिये घातक होता आदि.मतलब एक किशोर की बात को भी ध्यान से सुनना और उसे संतुष्ट करना ताकि वो स्वतन्त्र चिंतन जारी रखे, ऐसा संघ मे ही होता है. बाकि जगह तो कमांड और कंट्रोल से काम चलाया जाता है किंतु संघ मे पर्सुएशन और कोओपरेशन से काम होता है.

अगर आप स्वतंत्रता आंदोलन का अद्ध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि गांधी अपनीराय को मनवाने के लिये अनशन जैसे उपायो का सहारा लेकर अपनी बात मनवाते थे किंतु अपने विरोधी मत को वो ठहरने नही देते थे. गान्धी की वजह से सुभाष बोस, मुहम्मद अली जिन्नाह जैसे कई प्रतिभावान लोगो ने कांग्रेस छोडी तो नेहरू और इंदिरा की वजह से कईयो ने.नेहरु ने डा. राजेंद्र प्रसाद के साथ, सोमनाथ मंदिर के उद्ध्घाटन करने के मामले मे नेहरू की बात नही सुनने की वजह से क्या सलूक किया, आप सब जानते है. वही तमाम प्रतिकूलताओ के बावजूद भी, इक्का दुक्का अपवादो को छोड दे, तो जो भी संघ के सम्पर्क मे आया वो संघ से जीवन पर्यंत जुड गया, बल्कि जो विरोधी भी किसीवजह से संग बैठे (आपातकाल के दौरान) वे भी संघ के निकट हो गये और इस सबका का कारण संघ मे आंतरिक लोकतंत्र की स्थापित परम्परा का सदैव होना है. आलोचक महोदय इतना लोकतांत्रिक संगठन कोई दूसरा हो तो बताए.

 

4.  संघ पुरातनपंथी, मनुवादी और दलित विरोधी है. संघ के लोगो का बौधिक स्तर अत्यंत नीचा है और वहा सिर्फ लाठी चलाना सिखाया जाता है.

उत्तर ∶ आईये, जरा संघ के प्रमुखो की शैछिक योग्यताओ को देखे ∶

क्रम नाम कार्यकाल शैछिक योग्यता
1 डा. केशव बलिराम  हेडगेवार 1925–1930
1931–1940
चिकित्सा शास्त्र मे स्नातक
2 डा. लक्छमन वामन परांजपे 1930–1931 चिकित्सा शास्त्र मे स्नातक
3 माधव सदाशिव गोलवलकर 1940–1973 जीव विज्ञान मे परास्नातक
4 बाला साहेब देवरस 1973–1993 एल एल बी
5 प्रो. राजेंद्र सिंह 1993–2000 न्युक्लियर फिजिक्स मे परास्नातक
6 कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन 2000–2009 बैचलर इन ईंजीनियरिंग ( टेलीकोम्युनिकेशन )
7 मोहन भागवत 21 March 2009–present (incumbent बैचलर इन वैटिनरी साईंसेज एंड एनिमल हस्बेंडरी

 

संघ मे आपको शायद ही कोई प्रचारक मिले, जिसकी शैछिक योग्यता ग्रेजुएट से कम हो, बल्कि अधिकांश प्रचारक उच्च शैछिक योग्यताधारी होते है. संघ के स्वयमसेवक भी अमूमन मध्यम वर्गीय पढे लिखे नौकरीपेशा एवम व्यापारी वर्ग से होते है. अब आप स्वयम सोचे कि ऐसे लोगो का संगठन क्या पुरातनपंथी हो सकता है? उनका बौधिक स्तर नीचा हो सकता है? चूंकि संघ के लोग पढे लिखे है इसिलिये वे श्रेष्ठ भारतीय परम्पराओ के प्रति आग्रही होते है और भारतीय संस्कृति के लिये उनमे गौरव का भाव होता है और क्यु ना हो. हमारी परम्पराओ और सांस्कृतिक श्रेष्ठता आज पूरी दुनिया स्वीकार कर रही है और इससे सिद्ध होता है कि हम पहले भी सही थे और आज भी है, तभी दुनिया आज हमे अपना रही है.

“तिलक की मृत्यु के पश्चात बहुत से दल थे, परंतु किसी ने भी राष्ट्रीय जीवन के सर्वाधिक महत्तवपूर्ण पहलुओ- राष्ट्र के लिये गर्व पैदा करने वाले, देशभक्ती व आत्मसम्मान- पर ध्यानकेंद्रित नही किया. राष्ट्र के आधार को मजबूतकरनेके लिये यह आवश्यक है. डा हेडगेवार ने इसे कार्यानवित किया. जब संघ का आरम्भ हुआ तब विचारधारा के नाम पर एक शब्द था –राष्ट्र और संगठन मे एक श्रेणी थी- स्वयम्सेवक और आदर्शके रूप मे था भगवा झंड. जैसे जैसे सन्गठन का विस्तार होता गया, संगठन की रचना खडी होती गई. शाखा स्वयमसेवको का समष्टि रूप है. शाखा मे होने वाले देशी खेलो का उद्देश्य व्यक्ति मे सामूहिकता के भाव का संचार करना है. “– केसरी, 25 जून, 1940,पृष्ठ 8.

“संघ मे ब्राह्मणो, गैर ब्राह्मणो, एवम अस्पृश्यो के बीच किसी प्रकार का भेदवाद नही किया जाता. वे एक साथ खेलते, खाते और ध्वज प्रणाम कराते है. “– महादेव दिवेकर शाश्त्री, केसरी, 24 जुलाई, 1940,पृष्ठ 8.

“डा. भीमराव अम्बेडकर संघ के शिविर मे 1938 मे पूनामे आये थे. उन्होने महार स्वयम्सेवको के साथ सम्मान एवम समानता का भाव देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा था कि मैंने इस तरह से अस्पृश्यता समाप्त करने का कार्य पहले कभी नही देखा “– केसरी, 5 जुलाई, 1940,पृष्ठ 13.

“डा. हेडगेवार ने अस्पृश्यता, जात– पात पर के प्रश्न पर कभी समझौता नही किया. वह समग्रतावादी थे. जो लोग पिछडे है, अस्पृश्य है, उनका भी बराबर का हक है. इस ठोस मान्यता के कारण जातिवाद के आधार पर मध्यप्रांत के राजनीतिक व सामाजिक वातावरण मे वह और संघ के अन्य नेता खुलकर इन दोषो से लड रहे थे. वर्धा मे 1940 मे संघ की 84 शाखाये थी, जिसमे से 70 शाखाये गैर ब्राहम्ण आबादी वालेछेत्रो मे थी. “– केसरी, 24 जुलाई, 1940.

“डा. अम्बेडकर हिंदू समाज की मानसिकता मे जो क्रांति लाना चाहते थे वही डा. हेडगेवार जी का भी ईप्सित था. डा. हेडगेवार ऊंच – नीच, छूआ – छूत आदि की भावनाओ से मुक्त जिस एकरस और संगठित समाज जीवनकी रचना चाहते थे, वही डा. अम्बेडकर को भी अभीष्ट थी. “

– कुप्प सी सुदर्शन, समाज रोग के निदानकर्ता दो डाक्टर, पांच्जन्य, 23 अक्तूबर 1988. पृ –9–10.

“डा. हेडगेवार सामाजिक तौर पर अस्पृश्यता का निषेध करते रहे. वह पूना के न्यु ईंग्लिश हाईस्कूल मे अस्पृश्यो के साथ सहभोज के आयोजको मे से एक थे. 23 अक्तूबर 1932 को इसी स्कूल के छात्रो सम्बोधित करते हुए उन्होने कहा था कि साहस पूर्ण ढग से अस्पृश्यता का मुकाबला करे. “    – हितवाद, 27 अक्तूबर, 1932.

5.    सबसे अंत मे किंतु सबसे ज्यादा प्रचलित आरोप, संघ ने गांधी जी की हत्या की.

उत्तर ∶ इस आरोप का आधार था कुछ लोगो द्वारा निहित स्वार्थो की वजह से संघ को हिंदु महासभा से जोडा जाना, जबकि संघ और हिंदू महासभा दो अलग संगठन थे, जिनका उद्देश्य और कार्यपद्वति और नेत्रत्व अलग अलग था. आईये कुछ तथ्य देखे जाये

“पहला हिंदू राष्ट्रवादी जो फासीवादी व्यवस्था के सम्पर्क मे आया था, वह थे ड. बी एस मुंजे, जो एक राजनीतिज्ञ थे और जिनका संघ के साथ अंतरंग समबंध था. वास्तव मे डा. मुंजे डा. हेडगेवार के गुरु थे और दोनो मे घनिष्ठ मित्रता थी “ ( कैसोलरी मर्जिया, हिंदुत्वाज फारेन टाई अप्स इन थर्टीज, ईकोनोमिक एंड पालिटिकल वीकली, 22 जनवरी 2000.)

“ड. हेडगेवार एवम संघ सिद्धांत एवम संगठन रचना के लिये डा. मुंजे, जो कि एक फासीवादी थे, पर निर्भर थे“ ( प्रलय कानूनगो, आर एस एस अंद पालिटिक्स, 2001)

आईये अब जरा इतिहास मे झांके और देखे कि सच्चाई क्या है और संघ और हिंदू महासभा और डा. मुंजे के रिश्तो की असलियत क्या थी. इसी से हमे समझ आ जायेगा कि ये आरोप कितना गढा हुआ है और आज भी इसे सही सिद्ध करने का प्रयास जारी है.

“ ग्रहमंत्री श्री राघवेंद्र राव ने कहा से यह जानकारी प्राप्त की है कि डा. मुन्जे संघ के संस्थापक है. सच तो यह है कि डा. मुंजे का संघ की स्थापना, सम्विधान एवम संगठन से दूर दूर का कोई वास्ता नही है. संघ की बागडोर आरम्भ से ही एक व्यक्ति के हाथ मे रही है – वह है डा. हेडगेवार “ (सम्पादकीय, महाराष्ट्र , मार्च 1934)

“ मुंजे के पापो को संघ के माथे पर क्यो मढा जा रहा है? मैं सदन के सामने यह कहना चाहता हूँ कि डा. मुंजे का संघ के संगठन से कुछ लेना देना नही है. यह हो सकता है कि उन्होने अपने आप को इससे जोड लिया रखा हो “ ( बाबा साहब खापर्डे (कांग्रेस नेता), मध्य प्रांत विधान सभा का शीतकालीन सत्र, मर्च 1934.)

“ डा. हेडगेवार ने लिखा था कि महासभा के नेताओ को यह समझाने की आवश्यकता है कि संघ के स्वयम्सेवको का काम टेबल कुर्सिया उठाने का नही है. उन्होने आगे लिखा – परिस्तिथीवश जो चल रहा है वैसा ही और कुछ समय तक चलता रहे, इसकेबिना उपाय नही है.मैं जानता हू कि वहा की परिस्तिथिया स्वयम्सेवको को अत्यंत पीडादायक अनुभव होती है और इस कारण मेरा ह्रदय सदा व्यथित रहा है. “

“1934 मे डा. मुंजे ने मुझसे शिकायत की थी कि संघ महासभा से थोडा भी सहयोग नही कर रहा है. “

“यहा तक की विनायक दामोदर सावरकर ने भी पनवेल की सार्वजनिक सभा मे संघ की महासभा के प्रति तटस्तथा के लिये आलोचना की थी. उन्होने कटाछ करतेहुए कहा था कि संघ के स्वयमसेवको की कहानी ये होगी कि वह जन्मा,संघ मे शामिल हुआ और बिना कुछ किये हुए मर गया. सावरकर के उपयुक्त कथन के पश्चात निचलेऔर मध्य स्तर के महासभा के नेताओ ने संघ पर प्रहार और भी तेज कर दिया. इनमे माधव बिंदू पुराणिक, नाथूराम गोडसे (यहा ध्यान दे, गांधी वध आरोपी), वीर यशवंत राव जोशी, जी जी अधिकारी इत्यादि प्रमुख है. पुराणिक ने गोडसे, जोशी और सोलापुर के राजवाडे की सहमति से सावरकर को पत्र लिखकर संघ की तीखी आलोचना की थी. उन्होने संघ नेत्रत्व ( डा. हेडगेवार)  टिप्पणी करते हुए लिखा था कि वे संघियो को महासभा का काम करने को जान बूझकर रोकते है. उनके अनुषार हिंदू महासभा नेताओ का समूह मात्र है. वे ऐसे महत्त्वाकांछी है जिन्हे कांग्रेस् मे सम्मानित स्थान प्राप्त नही हुआ है. संघ कुटिलता से हमारा उपयोग अपना कार्य बढाने के लिये करता है. “   – जी वी देशमुख, काल समुद्रातील रत्ने, वीना प्रकाशन, नागपुर.पृष्ठ 155 से 157.

“जोग (संघ के शारीरिक शिक्षण प्रमुख (सरसेनापति) श्री मार्तण्ड राव जोग) ने मेरे कल के भाषण पर जोरदार विरोध जताया. मैं नही समझ पाया कि उन दोनो (डा. हेडगेवार और मार्तंड राव जोग) को मेरे भाषण के किस अंश पर आपत्ति थी. जोग के विरोध ने इस बात को स्प्ष्ट कर दिया कि वह मानकर चल रहे है कि मैं संघ के मंच एवम उसकी छवी का उपयोग अपने हित मे कर रहा हूँ. मेरी आंखे खुल गई. आगे से मैं संघ के मामले मे व्यक्तिगत ध्यान देनाबंद कर दूंगा. मैं उनकी सभा मे बोलने से भी इंकार करूंगा. मैं नही चाहता कि वे ये समझे कि मैं उनका शोषण कर रहा हूँ. “ (मुंजे पेपर्स, डायरी नम्बर 4, नेहरू स्म्रति संग्रहालय एवम पुस्तकालय, नई दिल्ली.)

“महासभा के नेताओ मे डा. मुंजे से डा. हेडगेवार की सबसे अधिक घनिष्ठता थी. इसका एक प्रमुख कारण यह था कि बाल्यकाल से ही उनकी देशभक्ती एवम आत्मविश्वास को डा. मुंजे का समर्थन एवम सक्रिय सहयोग मिला था ( डा. हेडगेवार की कलकत्ता मे मेडिकल की पढाई का खर्चा भी डा. मुंजे के सहयोग से ही सम्भव हो पाया था ). उन्हे क्रांतिकारी आंदोलन मे भी डा. मुंजे का सक्रिय सहयोग मिलता था. जहा डा. मुंजे का डा. हेडगेवार पर जीवन पर्यंत स्नेह बना रहा, वही डा. हेडगेवार के मन मे उनके प्रति सम्मान एवम आभार का भाव था.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एवम हिंदू संगठनो की प्रकृति, उद्देश्य, रचना और कार्यक्रमो के प्रश्नो पर दोनो के बीच का सम्बंध व्यक्तिगत सम्बंधो से भिन्न था. अलग अलग अध्यायो मे इस प्रश्न पर प्रकाश डाला जा चुका है. उदाहरण के तौर पर असहयोग आंदोलन एवम सविनय अवज्ञा आन्दोलन दोनो के प्रति डा. हेडगेवार की डा. मुंजे से भिन्न राय थी. इस प्रकार कांग्रेस एवम महात्मा गांधी को लेकर भी दोनो के दृष्टिकोणो मे अंतर था. “ (डा. केशव बलिराम हेडगेवार, राकेश सिन्हा, प्रकाशन विभाग, सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 2003.)

(2 अक्तूबर 1922 को गांधी जी का जन्म दिन मनाया जा रहा था.. डा. हेडगेवार कार्यक्रम की अध्यक्छता के लिये बुलाये गये थे. इससे गांधीवादियो मे उनकी छवि एवम लोकप्रियता का अनुमान अगाया जा सकता है. वहा उन्होने अपने भाषण मे कहा था)

“यह एक पवित्र दिन है. आज के दिन महात्मा गांधी के गुणो को सुनने एवम उन पर विचार विमर्श करने का दिन है. गांधी जयंती विशेषकर उन लोगो के लिये जो अपनेआप को गांधी समर्थक कहते है, विशेष महत्त्व की है.

महात्मा गांधी का सबसे बडा गुण उनके द्वारा अपने लक्छ्य की पूर्ती के लिये महान त्याग करने की छमता है. गांधी जी उन लोगो को पसंद नही करते है जिनके पास दोहरा व्यक्तित्व होता है, जो लोग लक्छय के प्रति प्रतिबद्धता की बात तो करते है परंतु कार्य उसके अनुषार नही करते. महात्मा गांधी की लक्छ्य रूपी नाव तब तक सफलतापूर्वक मंजिल तक नही पहुच सकती जब तक लोग महात्मा गांधी की जय बोलते हुए उनके कार्यक्रमो के समर्थनमे अपने हाथोको तो ऊठाते है परन्तु व्यवाहारिक जीवन मे उनके आदर्शो की खिल्ली उडाते है और एशो आराम से रहते है.“ (महाराष्ट्र, 3 नवम्बर 1922.)

“खादी का प्रयोग गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमो का अभिन्न अंग था.  डा. हेडगेवार असहयोग आंदोलन के दौरान खादी के वस्त्रो का ही प्रयोग करते थे. जब वह जेल से छूट कर बाहर आये तब उनके लिये आयोजित स्वागत समारोहो मे उन्हे खादी के वस्त्र एवम चरखा सम्मान के रूप मे दिया गया. काटोल, वाणी, चांदा एवम अन्य सभाओ मे उन्होने खादी के वस्त्रो के प्रयोग पर जोर दिया. उन्होने अपने भाषण मे कहा था कि खादी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक तो है ही, यह हजारो लोगो को रोजगार भी देती है“– महाराष्ट्र, 19 जुलाई, 1922, पृष्ठ 11

“मध्य प्रांत मे जहा जहा संघ का प्रभाव छेत्र था, वहा वहा गांधी जी (हरिजन) यात्रा को संघ का सहयोग मिला.उदाहरणार्थ प्रांत मे गोंदिया नामक स्थान पर पहुचने पर संघ ने बैन्ड की धुन बजाकर स्वयम्सेवको की सलामी से उनका स्वागत किया. “ (हितवाद, 16 नवम्बर, 1934.)

“गांधी जी ने कहा कि वह वर्षो पूर्व वह वर्धा मे राष्ट्रीय स्वयम्सेवक संघ के कैम्प मे गये थे. तब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार जीवित थे. स्वर्गीय जमना लाल बजाजउन्हे कैम्प मे ले गये थे और गांधी जी उनके (स्वयम्सेवको के) अनुशाषन एवम उनके बीच छुआ छूत की भावना बिल्कुलना होनेऔर सादगी से प्रभावित हुए थे “ (द हिंदुस्तान टाईम्स, 17 सितम्बर, 1947, पृष्ठ 2.)

“इसीलिये जब गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा तब उनके द्वारा स्थापित पत्र हरिजन ने प्रतिबंध वापसी की मांग की थी. पत्र ने सरकार के इस कदम को गांधी जी की भावनाओ एवम आदर्शो के विपरीत बताया थाअ. वह सम्पादकीय एक एतिहासिक दस्तावेज है“ (डा. केशव बलिराम हेडगेवार, राकेश सिन्हा, प्रकाशन विभाग, सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 2003.)

“मुस्लिम तुष्टीकरण एवम भारतीय राष्ट्रीयता को परिभाषित करने मे डा. हेडगेवार एवम महात्मा गांधी के बीच स्प्ष्ट मतभेद थे. लेकिन इन मतभेदो को डा. हेडगेवार ने राष्ट्रीय आंदोलन मे सहभागी होने मे रुकावट नही बनने दिया. “ (डा. केशव बलिराम हेडगेवार, राकेश सिन्हा, प्रकाशन विभाग, सूचना एवम प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 2003.)

“ डा. हेडगेवार को इस बात का श्रेय जाता है कि वह वीर सावरकर को आदर के द्रष्टि से देखते तो थे परंतु उन्होने अपने संगठन को हिंदू महासभा का अधीनस्थ कभी भी बनने नही दिया. “ (डी. वी. केलकर, इकानामिक वीकली, 4 फरवरी 1950, पृष्ठ 133.)

उपरोक्त तथ्यो से यह स्पष्ट होता है कि हिंदू महासभा और संघ बिल्कुल अलग प्रकृति के दो संगठन थे, जिनके बीच हिंदू राष्ट्रवाद की परिभाषा तक के विषय मे मतभेद थे. संघ ने अपने विस्तार मे हिंदू महासभा का सहयोग अवश्य लिया था और हिंदू महासभा को बदले मे काफी समय जनसहयोग दिया था किंतु दोनो के उच्च स्तर के नेताओ मे कम किंतु मध्यम और निचले स्तर (इसमे नाथू राम गोडसे भी शामिल थे) के नेताओ से गहरे मतभेद थे, और स्वयम नाथूराम गोडसे संघ के कट्टर आलोचक थे और उनके प्रभाव वाले पुणे मे वह संघ की गतिविधियो मे बाधा तक पहुचाते थे. वही गांधी जे से कुछ विषयो पर मतभिन्नता होते हुए भी संघ के स्वयम्सेवक उनके खादी और ग्रामोद्ध्योग और अस्पृश्यता निर्मूलन जैसे रचनात्मक प्रयासो मे आस्था रखते थे और उनका यथा शक्ति सहयोग करते थे. यही वजह है नेहरू सरकार भी संघ के गांधी वध मे सहयोग के आरोप को न्यायालय मे सिद्ध नही कर पाई और पूर्व की औपनिवेशिक सरकार की तरह उसे भी संघ के उपर लगा प्रतिबंध हटाना पडा.

संघ कभी आलोचानो का जवाब नही देता. डा. जी ने 12 नवम्बर 1937 को श्री काशीनाथ लिमये को लिखे पत्र मे लिखा था “समाचार पत्रो मे या सार्वजनिक सभाओ मे, संघ के बारे मे दुष्ट हेतू से प्रेरित आलोचना या किसी प्रकार की निंदा व्यंजक प्रलाप कभी भी किसी के द्वारा करने पर उसको प्रत्युत्तर देने मे संघ का कोई भी सद्स्य कभी भी ना उलझे“किंतु मैं प्रत्युत्तर देने मे विश्वास रखता हूँ क्युंकि मैं योगेश्वर श्री कृष्ण का भी अनुयायी हूँ, जो सौ गलतियो तक माफ करने के पश्चात दंड देते है, क्युंकि दंड न देने से दुष्टो का हौसला बढता है. दूसरा गाल आगे करने से सज्जन तो रुक जायेगा किंतु दुर्जन दूसरे गाल पर भी प्रहार करेगा ही और दुर्जन को सजा देने देने का उदाहरण हमारे पूर्वज राम, कृष्ण और शिव ने स्थापित किया है अतह ये लेख मैंने लिखा है. मैं फिर आपसे अनुरोध करूंगा कि आप इस लेख को यथाशक्ति शेयर करे और लोगो को पढने को इतना प्रेरित करे कि ये लेख गूगल सर्च ईंजन पर उपर आ जाये और दुनिया को संघ के विरुद्ध लगाये जाने वाले आरोपो की सत्यता मालूम पड सके.